राजस्थानी भाषा और विरासत

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राजस्थानी भाषा और विरासत

राजस्थानी एक समृद्ध इंडो-आर्यन भाषा है जिसकी अनेक बोलियाँ और सदियों पुरानी साहित्यिक परंपरा है।

1. प्रमुख बोलियाँ

  • मारवाड़ी: सबसे व्यापक क्षेत्र (जोधपुर, बीकानेर) में प्रचलित।
  • मेवाड़ी: उदयपुर और चित्तौड़गढ़ क्षेत्र की बोली।
  • ढूंढाड़ी: जयपुर और अजमेर क्षेत्र की बोली (इसे जयपुरी भी कहते हैं)।
  • हाड़ौती: कोटा, बूंदी और झालावाड़ क्षेत्र में प्रचलित।
  • मेवाती: अलवर और भरतपुर क्षेत्र की बोली।
  • बागड़ी (वागड़ी): दक्षिणी राजस्थान (डूंगरपुर, बाँसवाड़ा) की बोली।

2. साहित्यिक शैलियाँ

  • डिंगल: वीर रस प्रधान शैली, जो मुख्यतः पश्चिमी राजस्थान में प्रचलित रही।
  • पिंगल: श्रृंगार रस प्रधान शैली, जिस पर ब्रज भाषा का प्रभाव है।

3. प्रमुख साहित्यकार और रचनाएँ

  • मीराबाई: कृष्ण भक्ति के पदों के लिए प्रसिद्ध।
  • सूर्यमल्ल मिश्रण: 'वंश भास्कर' और 'वीर सतसई' के रचयिता। बूंदी के दरबारी कवि।
  • कन्हैयालाल सेठिया: 'पातल और पीथल' तथा 'धरती धोराँ री' के रचयिता।
  • विजयदान देथा ('बिज्जी'): लोक कथाओं का संग्रह 'बातां री फुलवारी' (14 खंड)।

4. लोक अभिव्यक्ति

  • फड़: कपड़े पर चित्रण के माध्यम से लोक देवताओं की गाथा (जैसे: पाबूजी की फड़)।
  • ख्यात: ऐतिहासिक वृत्तांत और राजाओं की वंशावलियाँ।
  • लोकगीत: कुरजां (विरह गीत), मूमल (प्रेम गाथा), गोरबंद (ऊँट के श्रृंगार का गीत)।

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